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28.2.10

बुरा मनो या भला क्या कर लोगे होली है :

लो क सं घ र्ष wishingfriends.com


रंगो की होली तो सब खेलते हैं।
खून जिगर भी बहाओं तो जानूँ।।
प्रेम के रंग में मन भी रंग जाए बन्धू।
कोई ऐसी होली मनाओं तो जानूँ।।
दो बदन मिलना केाई जरूरी नहीं।
दिल से दिल को मिलाओं तो जानूँ।।
ठुमरी वो फगुआ तो गाते सभी हैं।
प्रेम का गीत कोई सुनाओ तो जानूँ।।
मुहब्बत बढ़े और मिट जाए नफरत।
कोई रीति ऐसी चला तो जानूँ।।
रूला देना हँसते को है रस्में दुनिया।
रोते हुए की हँसाओ तो जानूँ।।
है आसान गुलशन को वीरान करना।
उजड़े चमन को बसाओ तो जानूँ
अपना चमन प्यारे अपना चमन है।
दिलोजान इस पर लुटाओं तो जानूँ।।
मिट जाए जिससे दिलो का अँधेरा।
कोई शम्मा ऐसी जलाओं तो जानूँ।।
ऐशो इशरत में तो साथ देती है दुनिया।
मुसीबत में भी काम आओ तो जानूँ।।
मुस्कराना तो आता है सबको खुशी में।
अश्कें गम पीके भी मुस्कराओ तो जानूँ।।
अपनों वो गैरों की खुशियों के खातिर।?
जमील अपनी हस्ती मिटाओं तो जानूँ

-मोहम्मद जमील शास्त्री

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। सभी चिट्ठाकार बंधुओं को परिवार सहित होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
-सुमन

बजट नीतियाँ लीक से हटने की दरकार

सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री कमल नयन काबरा की शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक 'आम आदमी - बजट और उदारीकरण' प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित हो रही है जिसकी कीमत 250 रुपये है उसी पुस्तक के कुछ अंश नेट पर प्रकाशित किये जा रहे हैं
-सुमन


भारत सरकार के सालना बजट के प्रावधान और उनके साथ जुड़ी नीतियाँ प्रत्यक्ष प्रभाव से देश की आबादी में अपेक्षाकृत अल्पांश को प्रभावित कर पाती हैं। इनमें से भी सभी का कुल मिलाकर बजट से भला ही हो, सम्भव नहीं हैं। आज की घड़ी न ही यह सम्भव है कि बजट के लाभों और उसकी लागत का न्यायपूर्ण वितरण हो । प्रगतिशील सार्वजनिक व्यय नीति (अर्थात अपेक्षाकृत निर्बल तबकों पर तुलनात्मक रूप से ज्यादा खर्च हो अपेक्षाकृत सबल लोगों के मुकाबले) की कभी चर्चा तक याद नहीं आती है। प्रगतिशील कर प्रणाली, अर्थात अपेक्षाकृत धनी लोगों के अनुपात से ज्यादा कर-राशि उठाई जाये तथा अपेक्षाकृत कम आय और सम्पत्तिवान तबकों से अनुपात कम, काफी चर्चित रही है। किन्तु मेेरी जानकारी के तहत किसी व्यवस्थित और विश्वस्तरीय अध्ययन ने भारतीय कर प्रणाली को प्रगतिशीलता का रूतवा नहीं दिया है। इन मुद्दो के अलावा किसी भी दीर्घकालीन जनोन्मुखी बजट-विमर्श में एक अन्य मुद्दा काफी ध्यान देने काबिल होता है। बजट में क्या-क्या शामिल हो सकता है, इसकी अनेक सम्भावनाएँ होती हैं। कुछ नुक्तों के शुमार करने का अर्थ है अन्य सम्भावित विकल्पों की अस्वीकृति। इसी साल की बात नहीं, अब तक किसी भी बजट के नामंजूर,नाशुमार तत्वों चलने से जितने बहुलांश भारतीयों को जितनी फौरी और दीर्घकालिन हानि उठानी पड़ी है, वह निस्सन्देह बजट प्रभावों की जद मंे आने वाले लोगों की संख्या और उनके हितार्थो से बेशुमार ज्यादा हैं। भारतीय राष्ट्र-राज्य के शक्ति-सन्तुलन में कोई ऐसा बदलाव नहीं आया है और न ही ऐसे बदलावों की दस्तक सुनाई देने के शुभ संकेत भी हमारी फिजां में हैं कि सन् 2009-10 के बजट से कोई आशा की जा सकती हैं।
किन्तु हमारे परिवेश तथा राष्ट्रीय जीवन में अनेक ऐसे तत्व उभर रहें हैं जो ऐसे बदलाव की बयार के लिए कोई छोटी-बड़ी खिड़की तो खोलें। कम से कम 2007 में जारी विश्व पूँजीवाद के पिछले आठ दशकों के बाद आये संकट को तो हमारे बजटकारों ने भी चीन्हा हैं। कहा जा रहा है धनी पूँजीवादी देशों के कर्तव्यों के कुप्रभाव ’अकारण’ हम पर भी लाद दिए गये है। जिस किस्म के भूमण्डलीकरण का ’स्वेच्छा’ से और डंके की चोट पर उसके गुणगान करते हुए वरण किया गया था, और इस बजट तथा सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण में अब भी उसकी शान में कसीदे पढ़े जा रहें हैं, आज उसी के दुष्प्रभावों से निजात पाने की इस साल के बजट की सबसे बड़ी चुनौती, पहला बड़ा काम माना गया है। इस दुष्प्रभाव की मुख्य पहचान नौ प्रतिशत सालाना आर्थिक उत्पादन से घटकर 6 से 7 प्रतिशत तक आना माना जा रहा है। खासकर इसके असर से भगोड़ी पूँजी का ’अपने पनहि’ करना, यानी खतरे के असर क्षितिज पर आते ही नौ दो ग्यारह हो जाना, निर्यातकों की आय घटना, शेयर कीमतों का औंधे मुँह गिरना, विदेशी मुद्रा भण्डार में कमी, कल-कारखानोें की उत्पादन बढ़त दर की गिरावट, भारतीय मुद्रा की अस्थिरता, आयात में कमी, माँग में कमी, व्यापक स्तर पर छँटनी, नयी नौकरियों के लाले पड़ने आदि के रूप में मंदी के बहुमुखी कुप्रभावों की चर्चा की गयी है। किन्तु मंदी से निपटने के सारे उपाय कम्पनियों और निर्यातकों के घटतें मुनाफे या सचमुच की हानि को पाटने से सम्बन्धित रहे है।जिनकी देश और विदेश में नौकरियाँ गयी हैं, जिनके परिवारों के मनी आर्डर कम और हल्के हो गये हैं या बन्द हो गये हैं, जिन कारीगरों, लघु उद्यमियों के रोजगार छिन गये हैं या बन्दी की कगार पर है, उनके लिए प्रत्यक्ष रूप से सहायक सरकारी कदमों के स्थान पर मुख्यतः अप्रत्यक्ष प्रयास बड़े उद्यमियों-निर्यातकों आदि के माध्यम से किए गये हैं। जब माँग का टूटा हो, पुरानी मशीनें अप्रयुक्त या अर्द्ध-प्रयुक्त हों, तो मात्र कम ब्याज दर से आकर्षित होकर कौन निवेश करना चाहेगा? वैसे हमारा ग्रहस्थ क्षेत्र, यानी प्रधान रूप से मध्यम आय तबका ही मुख्य बचतकर्ता है और बैंकों का बचत खाता सर्वाधिक प्रचलित बचत का तरीका। इतनी कम ब्याज दर, कि वह उपभोग की कीमतें बढ़त दर की मात्र एक-तिहाइ के लगभग हो, यानी उनका वास्तविक मोल ऋणात्मक हो, कैन नये उद्यम की ओखली में सिर देना चाहेगा? सामान्य स्थिति में भी असमावेशित-लोग सीमान्त स्तर पर होते हैं, मंदी के दौर में तो तिहरी मार के शिकार होते हैं। मंदी की मार, छूटती-घटती नौकरियों का देश और जले पर नमक के समान हैं। सरकारी राहत पैकेज में भी जगह नहीं मिलना।
-कमलनयन काबरा
(क्रमश:)

27.2.10

कांग्रेस आई महंगाई लाई...!!!

कांग्रेस आई महंगाई लाई...!!!
बजट २०१०-२०११ ने कांग्रेस के आम आदमी की जेब पर डाका डाला है.
आम आदमी ने कांग्रेस को सत्ता सौंपकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारा है.
नरेगा को मनरेगा का नाम दे दिया और ४० हज़ार करोड़ आवंटित कर लुटेरों और दलालों की जेब और भरने का अवसर दे दिया है.
आम आदमी जरूरत की चीज़ों के लिए पहले भी रिरियाता था और आज भी रिरिया रहा है. भारत का आम आदमी इंडिया के खास आदमी के सामने आज भी अपनी मूलभूत जरूरी चीज़ों के लिए हाथ पसारे लाइन में खड़ा है.
लाइन में खड़े आम आदमी को आप भी देखिए. यह फोटो मैंने अपने वीजीए कैमरा से लिया है. विगत १५ सालों से मैं भी उसी लाइन में खड़ा हूं( आपको मैं नज़र नहीं आउंगा क्योंकि मैं फोटो खींच रहा था)...!!!




































  


 


 


 

 

 

 


 


 

 


 

 
एक उम्र गुजर गयी लाइन में 
एक उम्र गुजर जाएगी लाइन में.

प्रबल प्रताप सिंह 

 

मोयली - किसान हितेषी सम्भीरका

खानदानी परिचय:
निडाना इगराह के किसानों द्वारा मोयली के नाम से जानी जाने वाली इन परजीव्याभ सम्भीरकाओं की जाति को कीट वैज्ञानिक Aphidius के नाम से पुकारते हैं| जीवों के नामकरण की द्विपद्धि प्रणाली के मुताबिक़ इनके वंशक्रम का नाम Hymenoptera तथा कुणबे का नाम Aphiidae होता है| इस परिवार में Aphidius नाम की तीस से ज्यादा जातियां तथा तीन सौ से ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं| जो कुल मिलाकर अल की चालीस से ज्यादा प्रजातियों को अपनाशिकार बनाती हैं|
जीवन यात्रा:
मोयली नामक इस सम्बीरका का जीवनकाल सामान्यतौर पर 28 से 30 दिन का होता है| सहवास के बाद मोयली मादा अपनी 14 -15 दिवसीय प्रौढ़ अवस्था में एक-एक करके 200 से ज्यादा अंडे देती है| दूधो नहाओ-पूतो फलन के लिए मोयली मादा को ये अंडे चेपों के शरीर में देने होते हैं| अंड-निक्षेपण के लिए उपयुक्त 200 से ज्यादा चेपे ढूंढ़ लेना ही मोयली मादा की प्रजनन सफलता मानी जाती है| पर यह काम इतना आसान भी नही है| इसके लिए मोयली मादा को चेपा खूब उल्ट-पुलट कर पुष्टता परजीव्याभिता के लिए जाचना-परखना होता है| अंड-निक्षेपण के लिए उपयुक्त पाए जाने पर ही अपने अंड-निक्षेपक के जरिये एक अंडा चेपे के शरीर में रख देती है| अंड-विस्फोटन के बाद मोयली का नन्हा लार्वा चेपे के शरीर को अन्दर से खाना शरू करता है| चेपे के शरीर को अन्दर ही अन्दर खाते-पीते रहकर यह लार्वा पूर्ण विकसित होकर प्युपेसन भी चेपे के शरीर में करता है| पेट में पराया पाप पड़ते ही चेपे का रंग हाव-भाव बदलने लगता है| इसका रंग बादामी या सुनैहरा हो जाता है तथा शरीर फूलकर कुप्पा हो जाता है| इसी कुप्पे में गोल सुराख़ करके एक दिन मोयली का प्रौढ़ स्वतंत्र जीवन जीने के लिए बाहर आता है| अंडे से प्रौढ़ के रूप में विकसित होने के लिए इसे 14 -15 दिन का समय लगता है| इस प्रक्रिया में चेपे को नसीब होती है सिर्फ मौत और किसान को भरपूर उत्पादन|
हरियाणा
प्रान्त में भी विभिन्न फसलों पर चेपे / अल का आक्रमण अमूमन आये साल की आम बात है| इसमें अगर खास बात है तो वो यह है कि कीट नियंत्रण रूपी फल की आस में किसान केवल कीटनाशकों के छिडकाव का कर्म ही करते हैं| पर काला सच यह भी है कि स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र का थोड़ा सा भी ज्ञान रखने वाला इंसान इस चेपे / अल के प्रबंधन में मोयली नामक सम्भीरकाओं की महत्ती भूमिका को नही नकार सकता| मोयली आकार में बहुत छोटे तथा बनावट में भीरड़नुमा कीट होते हैं जिनके शरीर की लम्बाई एक से तीन मिलीमीटर होती है| इन मोयली नामक परजीव्याभ सम्भीरकाओं को अपनी लार्वल एवं प्यूपल अवस्थाएं चेपे के शरीर में बितानी पड़ती हैं| मोयली के लार्वा का बसेरा एवं भोजन चेपे का शरीर ही होता है| "त्वमेव भोजनं त्वमेव आवास:" मोयली का लार्वा चेपे के शरीर को अन्दर ही अन्दर खा-पीकर पलता-बढ़ता है तथा पूर्ण विकसित होकर चेपे के शरीर में ही प्युपेसन करता है| इस प्रक्रिया में चेपे को नशीब होती है सिर्फ मौत यानि कि वही सज़ा जो किसान इस चेपे को कीटनाशकों का इस्तेमाल करके देना चाहता है|

अमेरिकन साम्राज्यवाद : अंतिम भाग

महायुद्ध
यूरोप में लड़ी गयी दो लड़ाइयों को विश्वयुद्ध संज्ञा दी जाती है- प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध। किंतु ज्यादा सही बात यह है कि दुनियां का प्रथम महायुद्ध सं0 रा0 अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में शुरू किया। यह युद्ध लातिन अमेेरिका कब्जाने के लिये स्पेन से लड़ा गया। स्पेन-अमेरिका युद्ध 1898 हुआ, जिसमें जीर्णशीर्ण स्पेन का राजतंत्र हार गया। फिर तो लातिन अमेरिका में यूरोप का प्रभाव घटता गया और वह धीरे-धीरे पूरी तरह सं0 रा0 अमेरिका के प्रभाव में गया। इसने प्रशांत महासागर के हवाई द्वीप पर कब्जा किया और फिलीपींस को भी दबाया। इस तरह पश्चिमी गोलार्द्ध से यूरो को निकाल बाहर कर अमेरिका ने उसे अपना गलियारा बनाया।
लातिन अमेरिकी देशों का शोषण-दोहन करने के लिये उसने एक मनरो सिद्धांत अपनाया, जिसके अंतर्गत वहां यूरोपियन देशों का हस्तक्षेप अवांछित करार दिया गया। सर्वविदित है, यूरोप के दोनों ही विश्वयुद्धों में अमेरिकी नीति मुनाफा कमाने की रही।
अलबत्ता द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत सोवियत यूनियन जब विश्वशक्ति के रूप में उभरा और समाजवादी अर्थव्यवस्था समानांतर विश्वव्यवस्था के रूप में सामने आयी तो अमेरिका के साम्राज्यवादी मंसूबो पर पाबंदी लगी।
सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी की 19वीं कांग्रेस में समाजवादी निर्माण की समस्याओं पर प्रस्तुत अपने आलेख में स्तालिन ने स्पष्ट कियाः ’’ अब दुनिया में युद्ध नहीं होगा।’’ इसका कारण बताते हुए स्तालिन ने कहाः ’’सोवियत यूनियन युद्ध नहीं करेगा, क्योंकि वह शांति का पक्षधर है और अमेरिका सोवियत पर हमला करने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि तब उसके सामने उसका अस्तित्व मिट जाने का वास्तविक खतरा उपस्थित होगा। स्तालिन की यह भविष्यवाणी सोवियत यूनियन की अमोध सामरिक ताकत पर आधारित थी। हमने देखा कि जब तक सोवियत यूनियन अस्तित्व में था तब तक सिर्फ शीतयुद्ध चलता रहा, किंतु वास्तविक युद्ध कभी नहीं हुआ।
सोवियत यूनियन के विघटन के बाद ही खाड़ी युद्ध प्रारंभ हुआ और योगोस्लाविया, इराक और अफगानिस्तान में वास्तविक युद्धों का अटूट सिलसिला चल पड़ा। अमेरिकी साम्राज्यवादी मंसूबा इस कदर बढ़ा कि उसने एकधू्रवीय विश्व अर्थव्यवस्था बनाने की एकतरफा घोषणा कर दी। वाशिंगटन कंसेंशन वास्तविक रूप में विश्व अर्थव्यवस्था का अमेरिकीकरण अभियान है। अंधाधुंध सट्टेबाजी के चलते वित्तीय संस्थानों का फेल होना और व्याप्त मौजूदा विश्वमंदी ने इस अभियान पर प्रश्न चिन्ह लगाया है और दुनिया को इसके दुष्परिणामों से सावधान किया है। राष्ट्रपति ओबामा के स्टेट आफ यूनियन को संबोधित ताजा संबोधन में अमेरिकी प्रभुत्व पुर्नस्थापित करने की छटपटाहट झलकती हैं। ओबामा को नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया है, पर यह तो उसकी घोषणाओं के महज आश्वासनों पर आधारित पाक मंशा है।ओबामा ने राष्ट्रपति पद संभालने के साथ प्रिज्म कैम्प बंद करने, इसरायल, फिलिस्तीनी वार्ता प्रारंभ करने, अलकायदा आतंक के अलावा क्यूबा के साथ संबंध सुधारनें की इच्छा प्रकट की थीं। ओबामा की इन घोषणाओं से दुनियां के शांतिकामी लोगों में आशा का संचार हुआ था। लगता है, ओबामा यह सब भूलते जा रहे है।
पूँजीवाद युद्ध केा जन्म देता है। गुजरी सदी के सभी युद्ध अतिरिक्त माल का बाजार ढूढ़ने के निमित्त लड़े गयो। वर्तमान वैश्वीकरण माल खपाने और मुनाफा कमाने की साम्राज्यवादी योजना का नाम है। तीसरी दुनिया के नवआजाद देशों ने अपनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र का निर्माण किया। फलतः साम्रज्यवादी देशों का बाजार सिकुड़ गया। 1980 आते-आते उन देशों में मंदी छा गयी। इस मंदी से निबटने के लिये नव आजाद देशों के स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को तोड़ना जरूरी था। तभी उनके मालों की लिये नया बाजार मिल सकता था। इसके लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक की मार्फत विकासमान देशों पर उदारीकरण और निजीकरण की शर्त थोपी थी। यहां यह भी ध्यातव्य है कि पूँजी और माल के बेरोकटोक मुक्त वैश्विक प्रवाह की वकालत की गयी, वहीं दूसरी तरफ श्रमिकों की आवाजाही पर रोक लगायी गयी। अमेरिका और यूरोपियन देशों में भारतीय श्रमिकों पर हमले हुएं। उन्हें देश निकाला गया। इस तरह विकसित औद्योगिक देशों के हित में पक्षपातपूर्ण साम्राज्यवादी वैश्वीकरण चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप देश के अन्दर और देशों के बीच गरीबी और अमीरी का फासला विस्फोटक सीमा तक फैल गया।
यद्यपि विकसित देशों में व्याप्त मौजूदा मंदी और वित्तीय संकट ने एकध्रुवीय दुनिया बनाने के मसूबे को तोड़ दिया है, फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक-सामरिक ताकत का विश्वव्यापी प्रभुत्व बरकरार है। और यह भी कि यूरोपियन यूनियन, शंघाई कोआपरेशन, ब्रिक वार्ता, (ब्राजील$रशिया$इ्रडिया$चायना) एवं अन्य क्षेत्रीय संगठनों ने दुनिया की बहुध्रुवीय बना दिया है, फिर भी मिलिटरी फैक्ट से बंधा मौजूदा अन्तराष्ट्रीय बाजार और विश्व अर्थ व्यवस्था का वास्तविक नियामक समूह-7 बना हुआ हैं। समूह-7 के देश असमान पक्षपातपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि (एन पी टी) के माध्यम से स्वयं तो परमाणु हथियारो का जखीरा रखते है, किंतु दूसरों को परमाणु विकसित करने के अधिकार से रोकते है। जलवायु परिवर्तन की मसले पर कोपनहेगन सम्मलन में अमेरिका सहित विकसित देशों ने एकतरफा कार्बन उत्सर्जन कम करने की कानूनी बाध्यता से अपने को मुक्त कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ इसने विकासमान देशों के कार्बन उत्सर्जन की मानिटरिंग और नियमन करने का अधिकार प्राप्त कर लिया है। जाहिर है, ऐसे उपायों से अमेरिका को आर्थिक चुनौती देनेवालो की धार कुंद हुई हैं।
ऐसे में पूँजी के वैश्विक आक्रमण से मानवता की हिफाजत की जिम्मेदारी मजदूर वर्ग पर आती है। विश्व पूँजी के बढ़ते आक्रमण को श्रमिकों की एकजुट अंतराष्ट्ीय कार्रवाई लगाम दे सकती है। भारत के प्रमुख केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों ने हाल के दिनों में तात्कालिक महत्व के पाँच मुद्दों पर संयुक्त कार्रवाईयां की है। यह ट्रेड यूनियनों की नयी एकता का सुखद संदेश हैं। 14 सितम्बर का दिल्ली संयुक्त कनवेंशन, 28 अक्टूबर की राष्ट्व्यापी संयुक्त रैलियां और 16 दिसम्बर को संसद के समक्ष विराट धरना ने मजदूर वर्ग में एकता का नया उत्साह पैदा किया है। सभी संकेत बताते हैं कि 5 मार्च को होनेवाला राष्ट्व्यापी सत्याग्रह ऐतिहासिक होगा। उस दिन दस लाख से ज्यादा मजदूर एवं कर्मचारी सत्याग्रह करके अपनी गिरफतारी देंगे। हमें आशा करनी चाहिए कि विश्व साम्राज्यवाद के विरूद्ध यह मजदूर वर्गीय कार्यवाई आगे आनेवाले दिनों में और भी ज्यादा व्यापक होगी।
-सत्य नारायण ठाकुर