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18.6.09

कैसे दूर होगा रैगिंग का कैंसर?

रैगिंग का सांप जिस तरह से हर साल कई छात्रों को निगलता जाता है, उसे देखकर लगता कि कब इससे निजातमिल पायेगी। हर साल कई बच्चे इसकी वजह से आत्महत्या करने जैसा बड़ा कदम उठा लेते हैं। रैगिंग को रोकनेके लिए देश की सबसे बड़ी ताकत सुप्रीम कोर्ट ने भी कई तरह के कड़ेकानून बनाये है, लेकिन हर बार ये कानून फ़ेल हो जाते हैं और किसीकाम नहीं आतेइसका उदाहरण दूंगा उस वक्त का जिसको मैने देखा है,झेला है.....जब मै अपने कॉलेज में पढ़ा करता था तो उस वक्त भी रैगिंगके मामले सामने आते थे। मैने जब पहली बार कालेज में कदम रखातो उस वक्त मेरी भी रैगिंग हुई थी। मै और मेरा दोस्त कॉलेज के गेटपर पहुंचे भी नहीं पाये थे कि हमें आवाज आई कि फ्रेशर इधर आओ।हम दोनों को अंदाजा तो हो गया था कि अब तो गये बेटा...हम दोनों वहां पहुंचे, पहुचते ही सबसे पहले उन्होने हमसेहमारा नाम पूछा उसके बाद कहा कि नाच कर दिखाओ बीच सड़क पर हमें नाचना पड़ाक्या करते अंजान शहरअंजान लोगइसलिए हमने नाचकर दिखाया, लेकिन बात आगे बढ़ती कि कॉलेज की ही रैगिंग टीम गई औरहमारी जान में जान आई। लेकिन सिलसिला यहीं ख़त्म नहीं हुआ था... ये तो सिर्फ शुरुआत थी। अब तो जो कोईसीनियर मिलता वो कुछ कुछ करने को कहता कोई नचाता तो कोई गाने गवाता। लेकिन खतरा तो तब और बढ़जाता जब हर कॉलेज की तरह यहां भी गुंडे टाइप के लोग जाते हैं और उनसे हर कोई डरता है। चाहे टीचर हो यामैनेजमेंटक्योंकि इनमें ज्यादातर उन लोगों बच्चे होते है जो या तो मंत्री के लड़के होते है या किसी आईएएसके.... उस वक्त आप ख़ुद समझ ही गए कि....... मेरे साथ भी ऐसा हुआ। एक बात और कि इस टाइप के बदमाशलड़के सूनसान जगहों पर ही आपको जाने को कहेंगे क्योंकि वहां मानने पर मारने पीटने की आज़ादी जो होतीहै। मुझे भी सूनसान जगह देखकर ले जाया गयासबसे पहले मुझसे मेरा नाम पूछा गया और रहने कास्थान...रहने का स्थान इसलिए पूछा जाता है, क्योंकि इसी बहाने पता तो लगे कि कहां रहता है या रहती है। मैनेबता दिया कि मुज़फ्फरनगर.... शहर का नाम सुनकर एक बार तो लड़के कुछ सोच में पड़ गये, शायद इस वजह सेकि मेरे शहर का इतिहास ज़रा सा खराब है...लेकिन आगे कोई मांग बढ़ती कि तभी उनमें से एक लड़के ने आवाजलगाई कि ओए...लड़की.......देख लड़की रही है.....एक लड़की पर उनकी नज़र पड़ गयी जो बचते बचाते वहां सेनिकल रही थी। पता नहीं मेरी किस्मत अच्छी थी या उसकी किस्मत खराब कि उन बदमाश लड़कों ने मुझे तो छोड़दिया, पर उस लड़की को पकड़ने चले गये। मैं तो अपनी जान छुड़ाकर भागा, लेकिन थोड़ी दूर जाकर ख्याल आयाकि क्यों जाकर देखू कि कहीं उस लड़की को वो बदमाश ज्यादा परेशान तो नहीं कर रहे हैं। मैने तुरंत खुद जाकरकॉलेज के लोगों को सूचित किया। तब वो लोग उसे बचाने या कहें कि उसे छुड़ाने वहां गये। जब वो वापस आई तोउसके आंखों में आँसूं थे।...उसके आंसू से आप सहज ही अंदाजा ही लगा सकते हैं कि उस बेचारी के साथ क्या हुआहोगा....उस घटना के बाद कॉलेज मे बबाल हुआ, लेकिन मैनेजमेंट लाचार था। लेकिन हिम्मत की दात देता हूं उसलड़की की, कि उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन जैसा मैनेजमेंट ने किया था कुछ करके..... उसीतरह पुलिस ने भी कुछ कियाक्योंकि उनमें से सभी उच्च अधिकारियों के लड़के थे और इसी वजह से मामलादबता चला गया। उस दिन के बाद से उस लड़की को रोज देखता था। क्योंकि मुझे लगा कि आखिर कैसे ये लड़कीइतना सहने के बाद भी कॉलेज में रही है और उन बदमाशों को भी देखता थाक्योंकि वो हमेशा की तरह किसी किसी लड़की को रोककर रैगिंग के नाम अभद्रता कर रहे होते थे और कॉलेज मामले को शांत करता नजर आताथा और ऐसा चलता रहा अगले तीन साल तक जब तक मै उस कॉलेज में पढ़ा। हालाँकि आज मै उस कॉलेज में नहींहूँ पर शायद यह सिलसिला अब भी चल रहा होगाआखिर कैसे दूर होगा रेगिंग का कैंसर?

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